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नीतीश कुमार: कुर्सी के लिए नैतिकता और सिद्धांतों को नीलाम करता एक अवसरवादी नेता-सुनील

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बिहार राष्ट्रीय जनता दल के प्रदेश सचिव सुनील कुमार ने मंगलवार को बताया कि आने वाले विधानसभा चुनाव में बिहार में काफी बड़े स्तर पर बदलाव लोगों को देखने में मिलेगा। क्योंकि माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के प्रति जनता में काफी गुस्सा है। नीतीश कुमार, बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल (यूनाइटेड) के नेता, भारतीय राजनीति में एक ऐसे शख्सियत के रूप में उभरे हैं, जिनकी पहचान अब उनके बार-बार दलबदल से होती है। उनकी यह प्रवृत्ति न केवल उनके राजनीतिक सिद्धांतों पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सत्ता की कुर्सी उनके लिए हर उसूल से ऊपर है। नीतीश कुमार को “पलटू राम” की उपाधि यूं ही नहीं मिली—यह उनके उस चरित्र का प्रतीक है, जो सिद्धांतों को ताक पर रखकर सत्ता के लिए किसी भी हद तक समझौता करने को तैयार है।

दलबदल का इतिहास: सत्ता के लिए सिद्धांतों की बलि
▪️ नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर चार दशकों से अधिक का है, जिसमें उन्होंने कई बार गठबंधन बदले। 1996 में उन्होंने समता पार्टी के साथ भाजपा का साथ चुना और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री बने। फिर 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाए जाने के विरोध में भाजपा से 17 साल पुराना नाता तोड़ लिया, यह कहते हुए कि वे धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर हैं। लेकिन 2017 में, जब आरजेडी के साथ गठबंधन में उनकी स्वायत्तता कम हुई, तो उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों का हवाला देकर महागठबंधन छोड़ दिया और फिर से भाजपा के साथ हाथ मिला लिया। 2022 में उन्होंने एक बार फिर भाजपा से नाता तोड़ा, यह आरोप लगाते हुए कि भाजपा उनकी पार्टी को तोड़ने की साजिश रच रही थी, और आरजेडी-कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाया। मगर यह गठबंधन भी ज्यादा दिन नहीं टिका—2024 में वे फिर से एनडीए में लौट आए। यह बार-बार का दलबदल साफ दिखाता है कि नीतीश के लिए सत्ता ही सर्वोपरि है, न कि कोई विचारधारा या सिद्धांत।

सिद्धांतों से समझौता: एक निंदनीय कृत्य
▪️ नीतीश कुमार कभी “सुशासन बाबू” कहलाते थे, जब उन्होंने बिहार में कानून-व्यवस्था सुधारी, स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती की, और महिलाओं के लिए योजनाएं लागू कीं। लेकिन उनका यह बार-बार पाला बदलना उनकी छवि को धूमिल कर गया। 2023 में उन्होंने कहा था, “मैं भाजपा के साथ दोबारा नहीं जाऊंगा, मरना पसंद करूंगा,” लेकिन एक साल बाद ही वे फिर से एनडीए में शामिल हो गए। यह केवल अवसरवादिता नहीं, बल्कि सिद्धांतों का खुला अपमान है। उनकी यह हरकत उस जनादेश का भी मखौल उड़ाती है, जो बिहार की जनता ने उन्हें दिया। 2022 में आरजेडी के साथ सरकार बनाई, और फिर 2024 में वापस भाजपा के पास लौट आए। यह जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़ नहीं तो और क्या है?

कुर्सी की लालच में खोई विश्वसनीयता
▪️ नीतीश कुमार की दलबदल की राजनीति ने उन्हें “किंगमेकर” तो बनाया, जैसा कि 2024 के लोकसभा चुनावों में देखा गया, जब भाजपा को बहुमत के लिए उनकी जरूरत पड़ी। लेकिन इस प्रक्रिया में उन्होंने अपनी विश्वसनीयता खो दी। उनकी यह छवि अब एक ऐसे नेता की है, जो कुर्सी के लिए किसी भी दल के साथ समझौता कर सकता है, चाहे वह भाजपा हो या आरजेडी—दोनों के साथ उनके वैचारिक मतभेद जगजाहिर हैं।

सत्ता के आगे सिद्धांत बौने
▪️ नीतीश कुमार का दलबदल निंदनीय है, क्योंकि यह न केवल उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को उजागर करता है, बल्कि बिहार की जनता के प्रति उनकी जवाबदेही को भी कमजोर करता है। एक समय समाजवादी विचारधारा और सुशासन के प्रतीक रहे नीतीश आज सत्ता की भूख में अपने सिद्धांतों को बार-बार कुर्बान करने वाले नेता बन गए हैं। यह उनके लिए शर्मिंदगी की बात है कि उनकी राजनीति अब विकास या विचारधारा से नहीं, बल्कि कुर्सी की जोड़-तोड़ से परिभाषित होती है। बिहार की जनता को ऐसे नेता से बेहतर की उम्मीद थी, जो सिद्धांतों पर टिका रहे, न कि सत्ता के लिए पलटने वाला “पलटू राम” बने।

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